29.3.09

जबलपुर ब्लागरो से आज से सम्बन्ध न रखने की घोषणा : महेन्द्र मिश्र जबलपुर.

दो वर्षो के दौरान ब्लागिंग में खासकर जबलपुर के ब्लागरो से जो कटु अनुभव प्राप्त हुए है उन सभी बिन्दुओ पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के पश्चात आज से मैंने जबलपुर शहर के समस्त ब्लागरो से सम्बन्ध न रखने का फैसला कर लिया है जिस तरह मुझे जिस तरह से ब्लागिंग की गन्दी राजनीति का शिकार बनाने की कोशिश की गई है उसको ध्यान में रखकर जबलपुर ब्लॉग जगत के हित में आज से जबलपुर के ब्लागरो से सम्बन्ध न बनाये रखने की घोषणा कर रहा हूँ . जबलपुर के ब्लागरो से विनम्र अनुरोध है कि वे कृपया मेरे ब्लॉग पर न आये और न ही किसी प्रकार की टीप अभिव्यक्ति मेरे ब्लॉग में प्रेषित करे . मै सदैव उनका आभारी रहूँगा.

महेन्द्र मिश्र
जबलपुर.

21 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

आप तो जबलपुर के ही रहने वाले है फिर ऐसा क्यों ? जबकि आप कहते हैं आपको जबलपुर की माटी से भी प्रेम है तो फिर जबलपुर के ब्लागरों मे क्या माटी की गंध नहीं रह गयी ? यह अजीब सा फैसला है -पुनर्विचार करें ! या पूरे परिप्रेक्ष्य को साफ़ साफ़ बताएं ! फतवा जारी न करें ! हम सभी किसी न किसी पूर्वाग्रह के शिकार हैं मगर इस तरह की घोषणा तो बिलकुल बचकानी है -न दैन्यम न पलायनम !

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

मिश्रा जी आपने ये घोषणा जिस मनोस्थिति में आकर करी है मैं ही क्या भड़ास के सभी सदस्य इस बात को समझ सकते हैं। भड़ास के जन्म का कारण ही यही रहा है एक दर्शन रहा कि दिल में जो भी तेजाबी अंश है उसे उगल दें ताकि हम स्वस्थ रह सकें। ओशो ने इसे अपने शब्दों में "कैथार्सिस" कहा और पातंजलि योग में इसे विचार-रेचन कहा गया है। बुरा, सनकी, फ़र्जी डाक्टर, दलाल और न जाने किन किन संबोधनो से पुकारे जाने पर भी अपने इस मनोस्वास्थ्य मंच को चला पा रहा हूं, जिसे गरियाना हो भड़ास पर आकर गरिया दीजिये लेकिन बस मां-बहन को निशाना न बनाएं। देखिये हम कैसे सफ़ेदपोशों के मुखौटे नोच कर गालियां खा रहे हैं अगर आप भी साहस कर पाएं.........

P.N. Subramanian ने कहा…

हमारी ऑर से भी पुँर्विचार याचिका दायर. जबलपुर संस्कारधानी है.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप का निर्णय बिलकुल पसन्द नहीं आया।

जी.के. अवधिया ने कहा…

कृपया क्रोध शान्त होने के पश्चात् पुनर्विचार करें।

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े जुड़े गाँठ पर जाय॥

MANVINDER BHIMBER ने कहा…

are bhai....kya ho gaya ...kuch samjh nahi aaya...

"अर्श" ने कहा…

MISHRA JI AAPKE IS TARAH KE NIRNAY KA SWAGAT TO NAHI KARUNGA.. BAS YE KAHUNGA KE JO JABALPUR KE BLOGGER HAI WO AAPSE SIKHNE SE WANCHIT RAH JAYENGE..KRIPYA KAR AISA NAA KAREN.... AAP PAR LEKHANI KI ASIM KRIPA HAI USE SAMBHAALEN AUR USASE DUSRON KO LAABH DE...

AAPKA
ARSH

डा० अमर कुमार ने कहा…


मिश्रा जी, मैं महसूस कर रहा हूँ..
कि आप एक बरगलायी आत्मा में परिवर्तित हो गये हैं ।
मुझे हमारा महेन्द्र मिश्र चाहिये.. न कि एक क्षुब्ध ब्लागर !

क्या ब्लागिंग की सीमा हिन्दी में अभिव्यक्ति से परे शहरों पर ही टिक कर रह गयी है ?
फिर तो, कल इसका मोहल्लाकरण भी होगा ..
यह किस प्रकार का वैश्वीकरण है ?
इन सभी को दरकिनार करके अपने को मातृभाषा से बाँधें रहें ..
इसको शहर प्रदेश या देश से न जोड़ें,
हिन्दी इतने तक सीमित रखने के लिये नहीं है..
मैं आपसे रुकने का आग्रह नहीं कर रहा हूँ..
पर आपके यूँ जाने पर खेद अवश्य होगा !

बवाल ने कहा…

पण्डितजी, अब हमारी आख़री टिप्पणी तो आपको स्वीकार करनी ही पड़ेगी और वो ये कि:-

इसके ऊपर फ़िल्म मुग़ले-आज़म में एक डायलाग है ---
"शेख़ू , तुमने हमारे मुँह की बात छीन ली"
और हमारे वाले जबलपुर में (आपके नहीं) एक कहावत भी है--
बाड़ी बेंड़े जाए, पूँछई उठाए ।
आपका आख़री बार बहुत बहुत धन्यवाद और नमस्कार।
आगे से आपको परेशान न करेंगे जी। वैसे आपकी हमारी तो कोई भी लड़ाई नहीं थी फिर भी आपने यह निर्णय लिया है तो ठीक है आपका यह निर्णय सर माथे पर। नर्मदे हर।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

भावावेश की अपेक्षा एक बार शांत मन से अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें तो बेहतर रहेगा......

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

सर जी , इस तरह के अलगाव से समाधान नहीं होने वाला । कभी-कभी बातें जरूर अखरती है पर जब शांत होकर विचार किया जाये तब जिस निष्कर्ष पर पहुंचेगें वह सही हो सकता है । और आप जैसे लोग इस तरह से दूरियां कायम रखेंगें तो यहा भी दरार उत्पन्न हो जानी संभव है । आप एक बार जरूर विचार करियेंगा ।

neeshoo ने कहा…

सर जी कितने ही लोग कह रहें हें । एक बार विचार करिये आप ।

रश्मि प्रभा ने कहा…

main is manahsthiti ko samajh sakti hun,yun hi koi is tarah jazbaati nahin hota

संगीता पुरी ने कहा…

मैं समझती हूं ... किसी बात की चोट पहुंची है आपको ... पर अच्‍छा नहीं हो रहा है यह ... एक बार पुन: विचार करें ... तब‍ि निर्णय लें।

Anil ने कहा…

"कल दिल्ली की एक लडकी ने मुझपर थूका. तो आज गहन सोच-विचार करके मैंने दिल्ली की सारी लडकियों से दूर रहने का फैसला कर लिया है".

जरा सोचिये! और मुस्कुराइये! :)

ब्लाग को अपने विचारों की अभीव्यक्ति का साधन-मात्र समझें. जीवन में और भी बहुत कुछ है घृणा करने को, ब्लागरों को उस श्रेणी में न रखें तो अच्छे मित्र मिलने की आशा लगी रहेगी. नहीं तो बंधु, मुझे ही जबलपुर आकर आपका भ्रम दूर करना पडेगा!

यह सब भूल जाइये, ३-४ दिन कंप्यूटर को हाथ मत लगाइये. बहुत आनंद आयेगा!

राज भाटिय़ा ने कहा…

मिश्रा जी,छोडो इन बातो को ओर एक बार दिल की बात कह दो लिख दो, बस सब कुछ अपने आप ठीक हो जायेगा, अब आप का मन मुटाव किसी एक या फ़िर दो से होगा..... इस के कारण सब से नाता तोडना क्या अच्छा होगा? इस समाज मै सब हमारी तरह से नही हमे खुद भी ओर के संग मिल कर चलना पडता है, कभी किसी ने कुछ ज्यादा कह लिया तो कोई बात नही, कभी हम भी तो कुछ गलत बो देते है ? अगर समाज मै रहना है तो सब कुछ सहन भी करना पडता है.... बिना समाज के रहना बहुत ही कठीन है, चलिये अब इस गुस्से को एक अच्छे से लेख मै लिख कर मन की भडास निकाल ले, आप को जिस से भी कोई शिकायत है एक बार खुल कर लिख दे अपनी शिकायत... फ़िर देखे सब ठीक हो जायेगा, सभी जबल पुरिये भी आप के अपने हो जयेगे.
अगर किसी बात का बुर लगे तो माफ़ करे. लेकिन अब गुस्सा थुक दे

विनीत कुमार ने कहा…

ब्लॉग जैसे ग्लोबल माध्यम को लेकर इस तरह की समझ रखना क्या सही है। मुझे नहीं पता कि आपके साथ क्या हुआ है लेकिन लोग हमारी पोस्ट से ज्यादा हम कहां से है, इस रुप में जानते हैं,जानकर हैरत हुई है। वैसे अक्सर लोग बताते हैं कि ब्लॉग को लेकर भी दमभर राजनीति होती है। पोस्ट के आधार पर नहीं, व्यवहार के स्तर पर।

बी एस पाबला ने कहा…

सिर्फ एक विनम्र अनुरोध,
पुनर्विचार करें

हालांकि इस निर्णय की पृष्ठभूमि मुझे मालूम नही।

Kajal Kumar ने कहा…

एक बार कहीं बहुत पहले, से.रा. यात्री के शब्द पढ़े थे कि साहित्य के क्षेत्र में गुटबंदी के बारे में जानने लगा तो साहित्य-रसास्वादन का डर आ खड़ा हुआ... इसी के चलते, और आगे पढ़ाई करने का इरादा छोड़ दिया. (साहित्य नहीं छोड़ा).

भाई मिश्र जी, सभी छोटी-बड़ी बातों का हिसाब रखने के लिहाज़ से, दुनिया बहुत बड़ी है. ज़रूरी नहीं कि पूरे शहर के ही प्रेमियों को भी इसलिए भुला दें कि महज कुछ लोग गैर ज़िम्मेदार निकले

ajay kumar jha ने कहा…

mahendra bhai,main samajh sakta hoon ki jab koi aise faisle letaa hota hai to wo khud uske liye kitna kashtdayee hota hai, mere vichaar mein to aap unse kinara kar lein jinse shikayat hai.

Anil Pusadkar ने कहा…

मै तो बस इतना ही कहूंगा कि क्षमा बड़न को चाहिये।