31.3.09

व्यंग्य -" तू मोखे तोक और मै तोहे तोकूँ " ब्लागिंग बनाम ब्लागिंग सहकारिता

सहकारिता का अर्थ है सब साथ साथ मिलकर काम करें . राजनीति में समाजो में नेतागिरी में या यो कहे ये सहकारिता रानी हर जगह मौजूद है साहित्य के साथ साथ ब्लागिंग भी अछूता नहीं रह गया है . शुरू शुरू में ब्लॉगर लम्बी रेस का घोड़ा बनकर खूब पोस्ट अपने ब्लॉग में लिख लेता है और उसके बाद का ब्लागिंग का जीवन मौज हा हा हूँ हूँ हंगामा करते निकल जाता है.

ब्लागिंग की सहकारिता में भी यही हो रहा है जब किसी तीसरे को जड़ से उखाड़ फेंकना हो तो तो पहले के साथ दो भाई मिल जाते है और इन भाइओ में उस समय गजब का उत्साह और आपसी समझबूझ और आपस में एक दूसरे से गजब का तालमेल देखने को तालमेल देखने को मिलता है. कहा जाता है कि चोर चोरी करते समय एकजुट तो होते है पर जब चोरी के माल का बंटवारा होता है तो यही चोर आपस में लड़ पड़ते है . आज के समय में सहकारिता रानी हर जगह मौजूद रहती है इन के बिना तो भाई लोग आपस में मिलकर कुछ भी नहीं कर सकते है .

पुराना मंजा मजाया ब्लॉगर खिलाडी बाद में अपने ब्लॉग में लेखन को छोड़कर सहकारिता की और ध्यान देने लगता है फिर वह ब्लॉग एग्रीकेटर या चर्चा का समूह बनाता है . जब भी सभी आपस में मिलते है तो हँस कर मुस्कुरा कर मिलते है और एक दूसरे की तारीफों के पुल बांधते है और आपस में गले मिलते है पर अन्दर ही अन्दर जो ज्वाला भड़कती है वह उस दौरान मुंह से बाहर नहीं निकल पाती है . ब्लागिंग की सहकारिता जब फल फूल जाती है तो ब्लागिंग की गुटबाजी खेमाबाजी को नित नए आयाम प्रदान करती है और हर खेमो का मुखिया शीर्ष ब्लॉगर होता है जो अपनों का सिर्फ संरक्षक होता है जो अपने चेलो को कहता है कि ब्लॉग में जो कुछ भी लिखना है तुम्हे मेरी तरफ से हरी झंडी है . जमकर खाल खींचो और जमकर बखिया उखाडो . मुखिया शीर्ष ब्लॉगर समय समय पर दूसरे ब्लागरो को हड़काने का भी काम करता रहता है .

खेमे परोक्ष रूप से एक दूसरे पर मिजाइल से हमला करते रहते है फिर एक गेंग दूसरे गेंग के हमलो की पप्पू कांट छांट करने में लगा रहता है . कोई किसी को घोचू अप्रेल फूल साबित करने में साबित करने में जुटा है तो कोई किसी से जबरन तू तू मै मै करता है . दूसरे के कार्यक्रम को फ्लाप बताया जाता है और अपने काम को बेहद अच्छा बताया जाता है .

२१ वी सदी में आदर्श ब्लागिंग वह मानी गई है कि "तू मोखे तोक मै तोखो तोकूँ" यह अपने बड्डे ब्लॉगर का कटु अनुभव है . सहकारिता की मिसाल ब्लागिंग जगत में बखूबी देखी जा सकती है . समूह बनाते है लोग मिलते है और करीबी पीछे छूट जाते है . अपनों के साथ कांफी पार्टी सैर सपाटा और साथ बैठकर विचार विमर्श करना और सम्मान में ब्लॉग में प्रेमनोट लिखना . जब पहले से मोह भंग हो जाता है ब्लॉगर दूसरे समूह में घुसने की कोशिश करता है और मोहब्बतों की पींगे बढाते है . एक दूसरो को मुख्य अतिथि और अध्यक्ष बनाने की घोड़ा दौड़ शुरू हो जाती है.

आखिरी की खरी खोटी यह है जब समूह मिशन में कोई शीर्ष बुढ़िया जाता है या कोई अवसरवादी समूह मिशन पर कब्जा कर नींव के पत्थर को झटके से एक तरफ कर देता है . तब शीर्ष सोचता है कि मैंने इसे खून पसीने से सींचा और मुझे एक झटके में रफा कर दिया ......तब उसे अपनी ब्लागिंग की सारी तरकीबे बरबस याद आने लगती है और अपनी करनी और कथनी दिमाग में घूमने लगती है . बड्डे ब्लॉगर बताते है कि यदि ब्लागिंग में अपना नाम करना हो तो "तू मोखे तोक मै तोखो तोकूँ" का सिद्धांत अपना लो . बस किसी को भी पकड़ लो उसे तोकना शुरू कर दो फिर देखिये जनाब ब्लागिंग की कामयाबी के शिखर के करीब पहुँच जाओगे जी . हाँ एक बात और कि सहकारिता पर जोर दो मिल जुलकर काम करो और तोकू और टोकने का काम जल्दी शुरू कर दें तो ब्लागिंग में आपकी चाँदी कट जायेगी यार और मौजा मौजा रहेगी .ब्लागिंग में पक्ष और विपक्ष की आधार शिला सहकारिता की भावना ही निर्मित करती है.

नोट- मै कोई व्यंग्यकार नहीं हूँ बस जो मन में आता है लिख देता हूँ कृपया इसे अपने ऊपर न लें क्योकि पिछला मेरा अनुभव यह है कि भाई लोग मेरी बात को अपने ऊपर जल्द ले लेते है इसीलिए शांत मन से पढें. यह व्यंग्य या मेरी अभिव्यक्ति किसी की बखिया उखाड़ने के लिए रचित नहीं है.


जो लिखना था सो लिख लिया और आज से ब्लागिंग से राम राम नमस्ते .

7 टिप्‍पणियां:

SWAPN ने कहा…

achcha vyangya likha hai aapne , aur swabhavik bhi hai aap itne senior blogger hain , blogging ki nas nas se vakif hain. badhai.

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

आपने सच नहीं कहा है कि मै लिखना सीख रहा हूँ,आपने अच्छा लिखा है .

ajay kumar jha ने कहा…

mahender bhai , kya baat hai idhar kuchh dino se aapkaa mijaaj kuchh alag sa hai, vyangya achha laga, mitra kuchh bhee dil se na lagaya karein aur wahee karein jo apkaa dil kehtaa hai, banki jaayein bhaad mein.

Gagagn Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

चलिए मैं और आप ही मिल जाते हैं। :-)

संगीता पुरी ने कहा…

ब्‍लागिंग से राम राम ... क्‍या कह रहे हैं आप ?

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

अच्छा भाई महेन्द्र जी,राम-राम......कल को मिलते हैं......वैसे कहीं आपके यहां 2 अप्रैल को अप्रैल फूल बनाने का रिवाज तो नहीं.?

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बढिया है...व्यंग्य का काम ही है सच उगलना.