12.6.09

अब रुकसत होने की आपसे इजाजत चाहता हूँ



मेहमान हूँ चंद घडियो का तेरी इस महफ़िल में
बुलावा वहां से कब आ जाये देखते ही देखते ही
अब रुकसत होने की आपसे इजाजत चाहता हूँ
बुलावा न आ जाये जाने की इजाजत चाहता हूँ.

००००

सुहाना समां देखते देखते ही पल में बदल गया
तेरा वजूद बिखरे जाम की तरहा मै भूल गया.

oooo

14 टिप्‍पणियां:

श्यामल सुमन ने कहा…

आपके पोस्ट को पढ़कर एक मशहूर शेर की याद आयी-

उजाला अपनी यादों का हमारे दिल में रहने दो।
न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाये।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail

Pyaasa Sajal ने कहा…

ab rookhsat hone ki baat mat kihiye...isi adaa me likhte jaaiye bas...

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

मिश्र जी
आप किस महफ़िल की बात कर रहे हैं?
और बुलावा कहाँ से आने वाला है?
कहीं कोई विदेशी बुलावा तो नहीं है ?
अरे बाई आप कहीं भी रहें, लेकिन ब्लागर्स की
महफ़िल से रुखसत होने की बात कभी मत कीजिये.
- विजय

Science Bloggers Association ने कहा…

वहॉं से इजाजत मिले न मिले, यहॉं से तो नहीं मिलेगी। अरे भई, अगर इजाजत दे दी, तो फिर आपकी रचनाएं कैसे पढने को मिलेंगी।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

अजय कुमार झा ने कहा…

क्या बात है महेंद्र भाई....आजकल मिजाज शायराना हो रहा है....कहीं फुर्सत में इश्किया तो नहीं रहे..ई रुखसती का बात सब मत किया कीजिये... हम गुसिया जायेंगे...

परमजीत बाली ने कहा…

यही है जिन्दगी।

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

परमजीत बाली जी
सच कह रहे है आप ये ही तो जिंदगी है .

राज भाटिय़ा ने कहा…

महेंदर जी कहां की बाते कर रहे है, अगर यह गजल है तो बहुत सुंदर है, लेकिन अगर हककित मै जाने की बात कर रहे हो जो भई अब जाना बहुत कठिन होगा, एक बार जा करे देखे दिल ही नही लगेगा हम सब के बिना, तो जनाब अब जाने की बात ना करे.
धन्यवाद

Prem Farrukhabadi ने कहा…

मिश्र जी,
बेरुखी मेरे ख्याल से इतनी ठीक नहीं.

लगाकर मेरे दिल से वो दिल अपना
बिना कुछ कहे चल दिए जाने कहाँ

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

यदि हम गलत नहीं हैं तो शायद रुकसत को रुखसत से बदलना सही होगा?
वैसे कहाँ चलने की तैयारी है?

"अर्श" ने कहा…

APNI IS BAAT KO BHI KITNE BEHATARI SE APNE RAKHA HAI YE KHUBSURATI DEKHTE BANTAA HAI...


BADHAAYEE

ARSH

P.N. Subramanian ने कहा…

एकबारगी हम भी विचलित हुए बिना नहीं रह सके, शीर्षक देखकर. सुन्दर रचनाएँ. आभार.

Arvind Mishra ने कहा…

अरे अब विवेक भैया आ गए हैं तनिक और रूक जाईये -हम भी किसी तरह आपने को रोके हुए हैं !

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

सुहाना समां देखते देखते ही पल में बदल गया
तेरा वजूद बिखरे जाम की तरहा मै भूल गया.
वाह .




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