8.2.10

आजकल के बच्चे समय से पहले ही बड़े हो रहे हैं ?

एक समाचार पत्र में पढ़ा की एक स्कूली छात्र ने अपने हाथ को ब्लेड से काटकर एक छात्रा का नाम लिखने की कोशिश की गई . उस बालक का यह दुस्साहस आने वाले समय की कहानी कह रहा है जब बचपन समाज के लिए नासूर साबित हो सकते हैं . बालक समाज के जिस माहौल में पलते और बढ़ते है और उस तरह के माहौल में जल्दी ही ढल जाते हैं और वे कच्ची मिटटी की तरह होते हैं उन्हें जिस रूप में ढलना चाहो वे ढल जाते हैं . आजकल स्कूली बच्चो द्वारा इस तरह की हरकत करना एक ट्रेंड और फैशन सा बन गया है और उन्हें ये सब माहौल आसपास के वातावरण से ही मिलता है जिसमे वे रहते और रचते हैं . इस तरह की घटनाओ के पीछे परिवार और समाज कुछ न कुछ भागीदारी तो रहती हैं .


आजकल टी.वी. चैनलों में जो दिखाया और परोसा जा रहा है उस पर अब सेंसर बोर्ड का को नियंत्रण नहीं रहा गया है और टी.वी. अपने उदेश्यों को लेकर भटक सा गया है . आजकल टी.वी. में जो भी कुछ दिखाया जाता है वह वयस्कों के लिए होता है और परिवार में बच्चे ऐसे कार्यक्रमों को देखकर वो सब कुछ जल्दी सीख लेते हैं जो उन्हें छोटी उम्र में नहीं सीखना चाहिए . आजकल टी.वी. ज्ञान नहीं खुलकर अश्लीलता परोस रहे हैं . इसके लिए कुछ हद तक पारिवारिक संस्थाएं भी जिम्मेदार हैं .परिवार में जब कोई छोटा बच्चा टी.वी. में फिल्म देखकर किसी हीरो या हीरोइन की नक़ल करता है तो परिवार वाले हँस हँस कर उसे प्रोत्साहित करते हैं . यदि कोई छोटा बच्चा ऐसा करता है तो हम सभी और समाज और आसपास का वातावरण भी जिम्मेदार है .



टी.वी.में बीच बीच में ऐसे विज्ञापन दिए जाते हैं जो बाल सुलभ मन पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं और बच्चो के मन पर इनका गहरा असर पड़ता है और उन्हें ऐसे कार्यो की करने की इच्छा होती है . बच्चो को वास्तविकता का अनुभव न होने के कारण बच्चे गहरे हादसों को अंजाम दे देते हैं . स्कूली छात्र ने अपने हाथ को ब्लेड से काटकर एक छात्रा का नाम लिखने की जो कोशिश की गई वह यह साबित करती है की बच्चे समयपूर्व ही पहले से बड़े हो रहें और उनका समय पूर्व विकास हो रहा है .

यह तथ्य वास्तव में समाज के लिए चिंताजनक और विचारणीय हो गया है की हम सभी अपने बच्चो को अच्छे संस्कार दें और बच्चो की मानसिकता बदलने के लिए हमें स्वयं की मानसिकता बदलने के लिए तैयार होना पड़ेगा अन्यथा आने वाले समय में इस तरह की घटनाए बढ़ती जावेगी जो समाज और परिवार के लिए घातक सिद्ध होंगी .

महेन्द्र मिश्र
जबलपुर की कलम से.

11 टिप्‍पणियां:

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

सही कह रहे हैं.

श्यामल सुमन ने कहा…

आपकी चिन्ता जायज है महेन्द्र भाई। सचमुच यही हो रहा है आजकल। चेतना जगाने वाली पोस्ट।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

सही कहा . आज कल के बच्चे इतना जानते है जो आप भी नही जानते

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

आपकी चिंता जायज है, पर कुछ किया नही जा सकता, किसी को समय ही नही है.

रामराम.

AlbelaKhatri.com ने कहा…

कला के नाम पर मुँह काला किया जा रहा है और लगातार किया जा रहा है लेकिन अब चिन्ता करने से कुछ भी होने वाला नहीं, इसे सहने की आदत डालनी होगी ...........हो सकता है ये शर्म की, क्षोभ की और दुःख की बात हो, लेकिन बात तो यही है साहेब !

महफूज़ अली ने कहा…

सही कह रहे हैं आप....

यशवन्त मेहता "सन्नी" ने कहा…

आप ने सही कहा, एक एक वाक्य सच है
परन्तु आज कल अभिवावक ही सतर्क नहीं है
उपर से मनोरजंन के नाम पर परोसे जाने वाले
प्रोग्राम्स आग में घी का काम करते है

Udan Tashtari ने कहा…

बिल्कुल सही कहा..बच्चे बहुत कुछ जान लेते हैं वक्त से पहले!

सतीश पंचम ने कहा…

मामला तो पहले भी काफी सुनने में आता था कि फलां ने ब्लेड से ये कर लिया, फलां ने खत को अपने खून से लिखा और भी न जाने क्या क्या.....।
इस तरह की बातें हम बचपन से ही सुनते आए हैं। लेकिन आए दिन जो तमाम वर्जनाएं टीवी फिल्मों आदि के जरिये टूट रही हैं तो उनसे भी इन चीजों को बढावा ही मिलता है।
पहले हम चंपक और लोटपोट पढने के लिए एक दूसरे से कॉमिक्स का एक्सचेंज करते थे। आजकल के बच्चे आपस में पेन ड्राईव, सीडी और माईक्रो एस डी कार्ड आदि को एक्सचेंज करते हैं। उनमें कन्टेंट किस तरह का होता है यह बताने की शायद जरूरत न हो।
बाकी तो तकनीक बदली है, बच्चों के सामने टीवी पर ही सच का सामना जैसे कार्यक्रम आते हैं जिसमें बेटी के सामने ही पिता से पूछा जाता है कि क्या आपके किसी और महिला से शारिरिक संबंध रहे हैं आदि आदि.....अब ऐसे में वर्जनाओं का टूटना लाजिमी है।
बढिया मुद्दा उठाया है आपने।

अमिताभ मीत ने कहा…

सही कहा आप ने. अफसोसजनक लेकिन सच. क्या करें !!

बवाल ने कहा…

बजा फ़रमाया आपने, पंडितजी।