* यदि दुर्गुणों को छोड़कर सदाशयता की रीति नीति को अपनाया जा सके तो समझाना चाहिए की मानवी गरिमा के अनु रूप मर्यादा पालन करना बन पड़ता है और हंसती- हँसाती, उठती- उठाती जिंदगी का रहस्य हाथ लग जाता है और ऐसे ही लोग ही धन्य हो जाते हैं . व्यवहारिक धर्मधारणा का परिपालन इतने सीमित सदगुणों को क्रिया कलापों का अंग बना लेने पर भी सध जाता है . व्यवहारिक धर्मधारणा और सेवा साधना शिष्टता सुव्यवस्था सहकारिता जैसे सदगुणों को जीवन में उतरने भर से बन पड़ती है. इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है. उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का यदि समावेश किया जा सकें तो समझना चाहिए की लोक -परलोक दोनों को ही समुन्नत स्तर का बना लिया गया है .
उन चार मानसिक विशेषताओ को १. समझदारी २. ईमानदारी ३. जिम्मेदारी ४. बहादुरी के नाम से समझा जाए.
* एक निवेदन आप सभी से -
रिटायरमेंट के बाद सोचा था की मैं खूब ब्लागिंग करूँगा और जी भरकर आपके ब्लागों का अवलोकन करूँगा परन्तु ऐसा नहीं कर पा रहा हूँ . अपने मकान के पुनर्निर्माण में लगा रहा . मेरा मयूर एक ही बेटा हैं जिसे मैं बहुत प्यार करता हूँ . अभी हाल में उसने एम.सी.ए. किया हैं और मकान निर्माण के दौरान उसे कंपनी की और से जॉब आफर आ गया है और उसे इन दिनों इंदौर और भोपाल की यात्रा करना पड़ रहा है और भविष्य में उसे इंदौर जैसे शहर में निवास करना पड़ सकता है . वाह री जिंदगी के सैलाब में इन दिनों मैं भावनात्मक रूप से बह रहा हूँ सोचता हूँ की शायद यह भी एक जिंदगी का एक अंग है . मकान तो बना लिया है पर बेटा भी मुझसे दूर रहेगा बस दिमाग में ये ही विचार आते रहते है .
खैर ईश्वरीय इच्छा के आगे सभी बातो से समझौता करना पड़ता है . करीब दस या पंद्रह दिनों तक मै आप सभी से दूर ही रहूँगा . रविवार के बाद मैं छतरपुर की यात्र पर जा रहा हूँ और अपने ब्लागर मित्र समीर यादव जी निश्चित रूप से मुलाकात करूँगा और इस सन्दर्भ में मेरी उनसे मोबाइल पर बात हो चुकी है . एक निवेदन सभी ब्लागर भाई बहिनों से - विगत एक माह से अत्यंत आवश्यक घरेलू कार्य होने से मैं नेट पर समय नहीं दे पा रहा हूँ और आपके ब्लागों को पढ़ भी नहीं पा रहा हूँ और अपनी विचार अभिव्यक्ति और टिप्पणी प्रेषित नहीं कर जिसके लिए आप सभी से क्षमाप्रार्थी हूँ .
14 टिप्पणियाँ:
सत्य वचन, ईश्वरीय इच्छा के आगे सभी बातो से समझौता करना पड़ता है. पिता-पुत्र को शुभकामनाएं!
बढ़िया विचार..जीवन है कुछ ना कुछ कार्य लगे होते है...और उतार चढ़ाव भी...आपकी यात्रा मंगलमय हो...
आईये सुनें ... अमृत वाणी ।
आचार्य जी
यही जिन्दगी की रीत है...पंडित जी. बेटे को अनेक शुभकामनाएँ. खूब तरक्की करे.
चिंतित न हों मिसिर जी,
भगवान सब कारज सिद्ध करेंगें।
"वाह री जिंदगी के सैलाब में इन दिनों मैं भावनात्मक रूप से बह रहा हूँ सोचता हूँ की शायद यह भी एक जिंदगी का एक अंग है . मकान तो बना लिया है पर बेटा भी मुझसे दूर रहेगा बस दिमाग में ये ही विचार आते रहते है ".
यही जीवन सत्य है महेंद्र जी, और यह सिर्फ अप ही के साथ नहीं बल्कि हरेक के साथ होता है !
क्यों चिंतित हैं... एक नेटबुक और एक वायरलेस ब्राडबैण्ड कनेक्शन ले लीजिये...
अपनी योजनाओं के साथ भगवान की योजनाओं पर विश्वास रखें, सब ठीक हो जायेगा ।
nice thoughts
जीवन की यही रीत है मिश्रा जी. हर हाल में खुश रहें आप, यही हमारी दुआ है।
समीर भाई को हमारा भी 'जय जोहार!' कहियेगा.
अच्छी प्रस्तुति........बधाई.....
bacche me aap ki virasat aur aap me bacche ke bhavishya ki jhalak chirantan sundar hota hai. chhawani, rajwada aur lalbagh, ek apne hi mijaj ka shahar hai indore. aapke mijaj ke muafik aa hi jayega aasha hai. shubhakamnae.
उन चार मानसिक विशेषताओ को १. समझदारी २. ईमानदारी ३. जिम्मेदारी ४. बहादुरी के नाम से समझा जाए. ----
----सच कहा---और इमानदारी हो तो सब गुण आही जाते हैं---एकै साधे सब सधै..
निरंतर की निरंतरता बनी रहेगी
इसमें तरता बनी रहेगी
रत रहेंगे इसमें
महेन्द्र भाई
इसमें भी लगती है हमें भलाई।
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