10.1.10

क्या यही स्वतंत्र अभिव्यक्ति का मंच है की किसी पर भी कुछ भी थोपो .... क्या ब्लागिंग जीनियस करते है आदि आदि ....क्यों न अब ब्लागिंग को राम राम कर ली जाये .

तीन सालो का ब्लागिंग का सफ़र .... खूब पोस्टे पढी.... खूब लिखी और खूब टिप्पणियां दिलोजान से अर्पित की . हिंदी ब्लागिंग को देखा जाना और समझा .... बस यही समझ में आया है की बस वही खींच तान, लल्लू चप्पू बाजी, संयमित मर्यादित नपे तुले शब्दों का अभाव , जो कहते है की गुटबाजी है इसे समाप्त किया जाना चाहिए वे ही गुटबाजी को बढ़ावा दे रहे है . किसी को भी अमर्यादित टीप भेज देना और वरिष्ट होने का दावा करना ...कहाँ तक उचित है . किसी की भी खिल्ली उड़ाना और किसी भी विषय पर विचार किये वगैर अपनी बात थोप देना आदि आदि यहाँ .... बखूबी देखने को मिल रही है ...अब तो इस मंच से साहित्यकार कवि लेखक भी जुड़ने से डरने लगे है ..

एक वर्ग विशेष को उभरते कलमकार चिटठाकार फूटी आँखों नहीं सुहाते है क्योकि उन्हें यह डर रहता है की इसके कारण उनकी ठेकेदारी ख़त्म हो जावेगी इसीलिए उसके लिए जल्दी गड्डा खोदने की तैयारी कर ली जाती है . . यदि कोई वंदा अच्छा लिख रहा है तो उसकी आलोचना करने वाले भी यहाँ जल्दी मिल जाते है और उस वन्दे पर यह आरोप लगा दिया जाता है की वह दोयम दर्जे की हिंदी लिखकर हिंदी को गर्त में ले जा रहा है आदि आदि . मेरा गुस्सा ब्लागिंग को लेकर इस रचना से भी समझा जा सकता है .


चिरागे दिल शमां बुझाकर जलाते है

ऐसे आदमी दीवाने यहाँ कहलाते है .

खुदा का नूर उनके चेहरों पर होता है

अश्क गरीबो के गम में यूं बहाते है

कैसे किसी की वफ़ा पर एतवार हो

हमें अपने पराये सभी सताने लगे है

तुम्हारा प्यार अब मुझे रास न आएगा

मेरे दोस्त मुझे ये सब बताने लगे है.

जब जर्द पत्ते खूब हवा देने लगे है

जीने की दुआ..... दुश्मन देने लगे है

गम हद से गुजर कर आने लगे है

उदासी से मंजिल का पता देने लगे है.

लम्बा तजरुबा हासिल करने के उपरांत मैंने निर्णय लिया है की क्यों न

अब ब्लागिंग से राम राम कर ली जाए तो कोई हर्ज नहीं है ?

राम राम राम ब्लागिंग आप सभी को मुबारक हो ब्लागिंग की ठेकेदारी आप को मुबारक हो .....क्या यही स्वतंत्र अभिव्यक्ति का मंच है की किसी पर भी कुछ भी थोपो .... क्या ब्लागिंग जीनियस करते है आदि आदि आदि...

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