6.10.08

हमें फ़िर से उन्हें गुनगुनाने में मजा आने लगा.

एक आशियाना सजाने में मेरी हस्ती मिट गई
उन्हें हालेगम सुनाने में तमाम उम्र गुजर गई
देखिये वो..एक पल में फ़िर से बेगाने हो गए
कई कई बरस लग गए उन्हें अपना बनाने में.

मेरे दिले गम पर कहकहे लगाए थे सभी ने
हमें सारे ज़माने में मुझे एक भी हमदर्द न मिला
गीत गजल.. जब मेरे अश्को पर ढल गए यारा
हमें फ़िर से उन्हें गुनगुनाने में मजा आने लगा.

कोई तो अपनी है जो मुझे अपने पास बुलाती है
यूँ बुलाती है मुझे वो मेरी प्यारी अपनी तो है
यारब उनका रहमो करम कैसे दिल से भुला दूँ
जो मुझे अपने आगोश में गहरी नींद सुलाती है.

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8 टिप्‍पणियां:

एस. बी. सिंह ने कहा…

bahut sundar

रश्मि प्रभा ने कहा…

ek bahut hi pyaari rachna........

PREETI BARTHWAL ने कहा…

महेन्द्र जी बहुत अच्छी रचना है
मुझे ये लाईन ज्यादा अच्छी लगी-
यारब उनका रहमो करम कैसे दिल से भुला दूँ
जो मुझे अपने आगोश में गहरी नींद सुलाती है.

राज भाटिय़ा ने कहा…

महेन्द्र जी आप तो शायर बनते जा रहे है, सारे शेर बहुत ही सुन्दर
धन्यवाद

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन!! वाह!

seema gupta ने कहा…

देखिये वो..एक पल में फ़िर से बेगाने हो गए
कई कई बरस लग गए उन्हें अपना बनाने में
" bhut khub, ek se bdh kr ek'

regards

bavaal ने कहा…

अहा ! ख़ूब !

Zakir Ali 'Rajneesh' ने कहा…

यारब उनका रहमो करम कैसे दिल से भुला दूँ
जो मुझे अपने आगोश में गहरी नींद सुलाती है.।


खूबसूरत पंक्तियॉं, सुन्‍दर गीत। बधाई।