29.12.09

व्यंग्य - चिटठा नगरिया जहाँ कूकर भौंके घुरके शूकर

ये देश कलमबाजो का देश है जहाँ पुन्य आत्माए जन्म लेती है . भगवान ने इन्हें चिटठा नगरिया में रहने जगह क्या दे दी ये अब कलमबाजो के अघोषित भगवान बन गए है .

यहाँ के हर जीव एक दूसरे को अपनी पोस्टो से जोड़ लेते है .

ये जीव प्रेम प्रसंगों से लेकर घुड़का बाजी तक पोस्ट लिखने में माहिर है और समय समय पर अपनी टीप उलीचकर अपने प्रेम का इजहार करते रहते है .

ये नव कलमकार को घुड़क कर यदा कदा अपना प्रेम उलीचते रहते है और स्नेहिल आशीर्वाद प्रदान करते रहते है ..

इनकी पहचान निम्न पंक्तियों से की जा सकती है .

रांड सांड सीढ़ी सन्यासी इनसे बचे तो सेवे चिटठा नगरी

और उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा कुछ इस प्रकार से भी की जा सकती है .

शूकर घुरके भौंके श्वान मारग रोके सांड सुजान

कलियुग कथा कहाँ लोउ बरनो जहँ तहं डोलत है चिटठाकार


उपरोक्त सभी प्रकार के कलमकार या चिटठाकार इस चिटठा नगरी के निवासी है . ये कन....खजूरे टाइप के है . ये प्राय एक समूह में रहते है .

ये अपने प्रेम का इजहार कलम से भौंक कर घुड़क कर करते है और जिस दिन ये चिटठा नगरी छोड़ देंगे उस दिन उनकी कलम की स्याही ख़त्म हो जावेगी और चिटठा नगरी के कलमकार उनकी भौंक और घुरके की आवाज सुनने से वंचित रह जावेंगे.

ये इस नगरी के उज्जवल प्रकाश पुंज है और इनका सीधे एग्रीक्रेटर से सम्बन्ध है इसीलिए वे कलमकारों के पूज्यनीय और वन्दनीय है .

श्वान रूपी चिटठाकार भैरव का शूकर रूपी चिटठाकार बराह अवतार का रूप है जिनकी खीसो पर सारा चिटठाजगत टंगा हुआ है .

एक जगह मैंने पढ़ा है की ""सांड सिंगानिया और मर्द मुछाड़ियाँ""" सांड जिस पर कृपा करें वो कलमकार सीधे स्वर्ग पहुँच जाता है और शूकर जिस पर घुरके वो चिटठालोक ही छोड़ देता है.

क्रमश :व्यंग्य-कल आगे प्रतीक्षा करें...

व्यंग्य भाग -दो- - चिटठा नगरिया जहाँ कूकर भौंके घुरके शूकर

शूकर और श्वान एवं सांड मुछाडिया प्रवृति के ये कलमकार जीव साहित्य समाज में चाहुनोर बखूबी देखे जा सकते है .

चिटठानगरी के कलमकार कुछ सांड मुछाड़ियाँ प्रवृति के होते है जो इस नगरी को अपनी उछल कूद का स्थल बनाए रहते है और समय और असमय अपने नथुने फुलाए रहते है . शूकर श्वान और सांड अपने अपने कर्मो के कारण इस जगत में अपनी अपनी अहमियत बनाए रहते है .

चिटठाकारिता पे शूकर घुरक देता है और अपनी आदत के मुताबिक कलमकारों के क्षेत्र में गन्दगी फैलाता रहता है . श्वान इस पर समय असमय भौंकता रहता है . ये जीव नेट जगत में आवारागर्दी करते रहते है पहले इन पर थोडा प्रतिबन्ध था पर जबसे इस जगत में इनकी भीड़ बढ़ गई है इनकी स्वेच्छा चरिता बढ़ गई है .

जब तक ये दुनिया में रहेंगे इनपर प्रतिबन्ध लगाना मुश्किल दिखता है .

***

9 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत-बहुत धन्यवाद
आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

राज भाटिय़ा ने कहा…

अरे बाबा किस पर गुस्सा कर रहे है आप, वेसे समझ मै कुछ आया नही.

निरन्तर ने कहा…

सर जी ये गुस्सा नहीं है . ये भी एक कलम की पुकार है जो कह रही है .

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

बढ़िया व्यंग..बधाई महेंद्र जी..कलमबाज़ों के देश में एक कलमबाज़ की इस बेहतरीन व्यंग को बधाई..खूब लिखा महेंद्र जी धन्यवाद!!

परमजीत बाली ने कहा…

बढ़िया पोस्ट।

Udan Tashtari ने कहा…

मसला तो बतओ मिश्र जी...कुछ मामले की तह में जाया जाये.


यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

नववर्ष में संकल्प लें कि आप नए लोगों को जोड़ेंगे एवं पुरानों को प्रोत्साहित करेंगे - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

आपका साधुवाद!!

नववर्ष की अनेक शुभकामनाएँ!

समीर लाल
उड़न तश्तरी

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

अद्भुत! चिट्ठाकारों पर अद्भुत व्यंग लिखा है आपने. "शूकर घुरके भौंके श्वान मारग रोके सांड सुजान", इस पंक्ति ने मन मोह लिया. बधाई.

नवीन शर्मा ने कहा…

chacha ji kis par gussa nikala hai.... naam to batao...

बवाल ने कहा…

अरे बाप रे पंडितजी,
ये रामसे ब्रदर्स टाइप की पोस्ट काहे लिख डाले।
सबके सब दहशत में आ गए भाई। हा हा।