श्री गणेश उत्सव के पावन पर्व के साथ दशहरा,दिवाली आदि त्योहारों की झडी लग जाती है . चारो तरफ़ लाउड स्पीकर और बाक्सों से भजन कीर्तन का शोर सुनाई देता है . चारो तरफ़ तरह तरह के भजन सुनाई देते है . हर साल लाखो भजन बनाये जाते है . कोई राष्ट्रिय स्तर पर तो कोई प्रान्त स्तर पर लोकप्रियता हासिल कर लेता है . आजकल द्विअर्थी शब्दों से लबरेज भजन तैयार किए जाते है जो केवल युवा पीढी के लिए मनोरंजन बन कर रह जाते है इन गीतों,भजनों से हमारी धार्मिक भावनाए आहत होती है जैसे ....
कैसी कृपा करी गणराज पप्पू पास हो गया , तुम भंग छोड़ दो स्वामी नही तो मै मइके भाग जाऊ , ओ पप्पू के पापा ओ गणेश की मम्मी , अ र र मेरी जान है राधा इन दिनों शहर के गली कूचो में मुहल्लों में गूंज रहे है .
हर साल जबलपुर शहर में करीब ४० से अधिक एलबम लोकल विडियो लांच होते है जिनमे धार्मिक भावनाओ को आहत करने वाले शब्द फूहड़ नृत्य के काम आते है . लोकभाषा के दुरुपयोग से तैयार ये गीत.भजन भाषा भावः और भक्ति के परखच्चे उडाने में खरे उतरते है . इंसानी दिमाग में मनोरंजन चर्चित होने और व्यवसाय का भूत इसकदर हावी हो गया है कि वह अपने धार्मिक देवी देवताओं को भी भूल गया है जिसके जीते जागते प्रमाण उपरोक्त भजनों में देखे सुने जा सकते है . गणेश जी दुर्गा जी शंकर भगवान राधा-कृष्ण के नाम का उपयोग कर ये भजन गीत धार्मिक भावनाओ को लगातार आहत कर रहे है .
विद्वानों के अनुसार द्विअर्थी संवाद बुन्देली मलावी बधेली छत्तिसगढ़ी और निमाड़ी हर भाषाओ में होते है . लोकगीतों का कोई इतिहास नही है उनका किसने सृजन किया यह किसी को मालूम नही है . हर किसी को लोजगीतो और लोकभाषा का तकनीकी ज्ञान भी नही होता है पर ऐसे लोग फिजूल के शब्दों का प्रयोग कर भाषा को बरबाद कर बुन्देलखंडी भाषा के भजन का नाम देकर खूब कमाई कर रहे है .
एक साहित्यकार ने कहा शब्दों के पर्यायवाची समानार्थी और दो अर्थ होते है. जिनमे एक शब्द शुभ अर्थ वाला और दूसरा शब्द अशुभ अर्थ वाला होता है .जिनका सामाजिक महत्त्व श्लील दूसरा अश्लील होता है . बुन्देली मधुर और अच्छी भाषा है अब कलाकार या रचनाकार अशुभ शब्दों का प्रयोग करने से नही चूक रहे है जिससे लोकमंगल होने की बजाय लोक अहित होने की अधिक संभावना है ..
सुबह सुबह जब ऐसे वाहियात गाने सुनने मिलते है हर ऊंटपटांग शब्द और उल्टी सीधी तुकबंदी के साथ भगवान को जोड़कर लोग धर्म के साथ खिलवाड़ कर रहे है और लोगो की धार्मिक भावनाए आहत हो रही है . ऐसे भजन गाने बंद तो नही हो रहे है निरंतर बढ़ रहे है बस अब जरुरत है कि ऐसे गाने भजनों के मार्केट में आने के पहले कटिंग छटिंग करने के एक संस्था का गठन किया जाना चाहिए और इन गीतों भजनों की सेंसरशिप की जाना बेहद जरुरी हो गया है . ऐसे गीत भजन युवा वर्ग के संस्कारो पर विपरीत असर डाल रहे है .
जय श्री गणेश बब्बा की .
11 टिप्पणियां:
आपने एकदम टू द पोइण्ट लिखा है
sahi kah rahe hai....
आप बहुत सही कह रहे हैं. मैं भी अक्सर ऐसा ही सोचती हूँ. एक सटीक और सुंदर लेख के लिए बधाई.
बिलकुल सही लिखा है आपने, भजन के नाम पर कुछ और ही सुनने को मिल रहा है इन नये एलबम के गानों में, इन्हें भजन कहना कहीं से भी उचित नहीं लगता।
Filmi gaanon ki tarj par jo bhajan banaye jate hain, unke baare men bhi vichar kiya janaa chahiye. unhe sun kar tio dimag men film ka hee drishya goonjta hai.
भजन और भगवान् के नाम पर क्या नहीं बजता है ?
महेन्दर जी आप ने मेरे मन की बात कह दी, ओर ऎसे भजन अब मंदिरो मे भी बजने लगे हे,
यह अफसोस की बात है कि आजादी एवं रचनात्मकता की आड में धारिमिक भावनाओं एवं आस्थाओं के साथ खिलवाड हो रही है!!
-- शास्त्री जे सी फिलिप
-- समय पर प्रोत्साहन मिले तो मिट्टी का घरोंदा भी आसमान छू सकता है. कृपया रोज कम से कम 10 हिन्दी चिट्ठों पर टिप्पणी कर उनको प्रोत्साहित करें!! (सारथी: http://www.Sarathi.info)
महेंद्र भाई अच्छा आलेख है
फ़िर भी कुछ बात है जो मैं फोन से करूंगा
बधाई
Bilkul Sahi wishay Uthaya hai aapne . Dheere dheere hamare filmi geeton ka asar humare Bhajano par bhee pad raha hai. inka bahishkar to hum kar hee sakte hain, masalan jahan aise geet baj rahe hon wahan se uthkar aa sakte hain.
दरअसल ये सारे गाने निरर्थक हैं -पता नहीं इनमें कई अर्थ क्यों दूंढे जाते हैं -हमारी संस्कृति दोषी है !
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