13.7.09

वादाखिलाफी की हद अगर ... दिल में है

वादाखिलाफी की हद अगर .... दिल में है
अपने दिल में.. हिसाब तुम लगा कर देखो.
oooooooo
रफ्ता रफ्ता....क़यामत के दिन आ गए है
बदलते बदलते...मुलाकात के दिन आये है

12 टिप्‍पणियां:

गुस्ताख़ ने कहा…

बदलते-बदलते ही बहार के दिन आते हैं,
कड़ी धूप के बाद कजरारे मेघा छाते हैं,
बूंद पाकर ही धरती की कोख होगी हरी,
रफ्ता-रफ्ता मुलाकात की आएगी घड़ी।

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

"बदलते-बदलते ही बहार के दिन आते हैं,
कड़ी धूप के बाद कजरारे मेघा छाते हैं,
बूंद पाकर ही धरती की कोख होगी हरी,
रफ्ता-रफ्ता मुलाकात की आएगी घड़ी"
गुस्ताख जी
आपकी कवितामय टीप पढ़कर तबियत खुश हो गई है बहुत सुन्दर इरशाद .आभार

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

रफ्ता रफ्ता....क़यामत के दिन आ गए है
बदलते बदलते...मुलाकात के दिन आये है ..
वाह गुरुवर वाह.

Udan Tashtari ने कहा…

भई, गुस्ताख जी की टिप्पणी ने तो चार चाँद लगा दिये.

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi sundar ..........khubsorat hai

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi sundar ..........khubsorat hai

P.N. Subramanian ने कहा…

महेंद्र जी के साथ गुस्ताख जी की जुगलबंदी ने fiza को रसमय bana दिया. आभार.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत अच्छी रचना.

रामराम

राज भाटिय़ा ने कहा…

वाह क्या बात है उपर से गुस्ताख़ की ्जुगलबंदी.
बहुत खुब.
धन्यवाद

Nitish Raj ने कहा…

आप ने महेंद्र जी कमाल किया गुस्ताख जी ने उसको मालामाल किया वाह।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

क़यामत की मुलाकात.

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

रफ्ता रफ्ता....क़यामत के दिन आ गए है
बदलते बदलते...मुलाकात के दिन आये है...

adbhoot virodhabaas !!