17.3.10

बढ़ती नकाब संस्कृति पर विचार...

जब मैं बहुत छोटा था उस समय महिलाये बड़े बुजुर्गो का मान सम्मान करने के लिए घूंघट का सहारा लिया करती थी . समय बदलने के साथ साथ लोगों की विचारधारा में परिवर्तन हुए आज स्थिति यह है की जगह जगह घूंघट की जगह लडके और लड़कियों में नकाब पहिनने का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है .



ठण्ड के दिन हों या गरमी के दिन हों लडके और लड़कियाँ पूरा चेहरा ढांक कर घर से बाहर निकलते हैं . गली में सड़कों पर ऐसे बहुत से नकाब धारी देखने को मिल जाते हैं . बढ़ती नकाबपोशी के सम्बन्ध में मैंने कई बुजुर्ग लोगो से उनके विचार जानने चाहे और सभी ने इस बढ़ती नकाबपोशी पर अपने विचार कुछ इस तरह से प्रस्तुत किये जो इस तरह से हैं .

एक बुजुर्ग ने तीव्र रोष प्रगट करते हुए कहा की इन नकाबधारियो की पहिचान करना मुश्किल है की वह लड़की है अथवा लड़का है . कई लोग नकाब पहिनकर अपराध करते हैं जिससे मौके पर उनकी पहिचान करना मुश्किल हो जाता है . कई लडके और लड़कियाँ नकाब पहिनकर तौलिये से पूरा चेहरा ढांककर गलत कामो को अंजाम देते हैं . आजकल आधुनिकता की दौड़ में कई लडके और लड़कियाँ पूरा चेहरा ढांककर लिपटकर बाइक पर तेजी से निकल जाते हैं तो परिवारजन भी उस समय उन्हें पहिचान नहीं पाते है और नकाब की आड़ में लडके और लड़कियों क्या कर रहे हैं और कहाँ जा रहे हैं यह परिवारजन भी अनुमान नहीं लगा सकते हैं .



इस सम्बन्ध में मैंने लड़कियों से भी चर्चा की और उनके विचार जाने की कोशिश की तो नाम न छापने की शर्त उन्होंने अपने विचार कुछ इस तरह से दिए . एक लड़की ने कहा इसे पहिनने से धूप में चेहरे की त्वचा जलती नहीं हैं और त्वचा काली नहीं पड़ती हैं .

एक बहिन जी और वहां खडी थी उनका कलर कुछ काला था उनसे मैंने पूछा बहिन जी आप वैसे ही काली है और भगवान ने आपको काली त्वचा प्रदान की है तो आप नकाब से चेहरा और हाथपोस वगैरा क्यों ढांक कर रखती हैं तो बहिन जी ने उत्तर दिए वगैर अपनी आंखे ततेर दी .

एक अन्य बहिन जी ने कहा चेहरा ढांककर चलने से रास्ते में शोहदे छेड़ते नहीं हैं कम से कम नकाब पहिनने से और चेहरा ढांककर चलने से छेड़छाड़ से और बढ़ते प्रदूषण से उन्हें मुक्ति मिल जाती हैं . ये तो नकाब के फायदे और नुकसान के सम्बन्ध में सबकी पक्ष और विपक्ष में राय हैं .


एक डाक्टर से नकाब और चेहरे को ढांककर रहने के सम्बन्ध में उनके विचार जाने उनका कहना है की लगातार चेहरा ढांके रहने से और लगातार उपयोग में लाया जाने वाला टाबिल गन्दा रहने से पहिनने वाले को चेहरे में त्वचा और फंगस रोग हो सकते हैं . अंत में मेरा इस सम्बन्ध में विचार हैं की बढ़ते अपराधो पर रोक लगाने के ध्येय से बढ़ते नकाबो पर रोक लगाईं जाना चाहिए . महानगरो में आजकल कई अपराधिक घटनाओं को नकाबपोश धारी अपराधियों द्वारा अंजाम दिया जा रहा हैं . नकाब पहिनकर चैन स्नैचिंग और लूट पाट की घटनाए बढ़ती ही जा रही हैं अतः सभी से अनुरोध है की जब आप सही हैं तो आपको नकाब पहिनने और चेहरे पर टावल लपेटकर सड़क पर चलने की जरुरत ही क्या है . आदमी को हैलमेट आदि का प्रयोग करना चाहिए जिसको पहिनने से कम से कम व्यक्ति को पहिचाना तो जा सकता हैं .

आलेख - महेंद्र मिश्र जबलपुर

7 टिप्‍पणियां:

विजयप्रकाश ने कहा…

जिस भी मामले में धर्म-मजहब आ जाता है उसे निपटाना टेड़ी खीर हो जाता है.
आपको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें.

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप से सहमत है जी,

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

bilkul sahi kahin misra ji. lekin inhe kaun samjhaye..

संजय भास्कर ने कहा…

bilkul sahi kahin misra ji. lekin inhe kaun samjhaye..

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बिल्कुल सही कहा.

रामराम

Ram Krishna Gautam ने कहा…

बढ़ती नकाब संस्कृति पर आपके विचार पसंद आए...







"RAM"

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पर्दा है पर्दा -----