23.12.09

टूटे दिल की आस : हर साँस चलती है ओ जानम तेरे नाम से

मेरी हर साँस चलती है ओ जानम तेरे नाम से
मेरी हर रात यूं कटती है ओ जानम तेरी याद में.
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जानम कुर्बान हम तेरी प्यारी सूरत देख कर हो गए
तुमसे मोहब्बत करके जानम हम बदनाम हो गए.
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तेरा करते करते इंतज़ार सारी जिन्दगी गुजर गई
आपसे एक अर्ज है आशियाँ इस दिल को बना लो.

18.12.09

जोग - ताउजी और महाताउश्री और डाक्टर झटका के कारनामे

प्रसूतिग्रह के डाक्टरों की सभा चल रही थी . सभा में परिचर्चा का मुख्य विषय था " साहित्य और साहित्यक वातावरण का गर्भिणी पर प्रभाव ".
परिचर्चा में चर्चा करते हुए डाक्टर ताऊ महाश्री ने कहा - साहित्य का तो मैंने प्रत्यक्ष प्रभाव देखा है एक बार मैंने एक पेसेंट को " दो बेटी " नामक पुस्तक पढ़ने दी बाद में उस महिला को दो लड़कियाँ पैदा हुई .
डाक्टर ताउजी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा - मै आपकी बातो का समर्थन करता हूँ मैंने भी एक स्त्री को " तीन तिलंगे " नामक पुस्तक पढ़ने दी थी बाद में परिणामस्वरूप उस स्त्री के यहाँ तीन तीन लफंगे उप्रद्रव करने आ टपके .
इसी परिचर्चा के बीच डाक्टर झटका अचानक परिचर्चा छोड़ कर जाने लगे तो डाक्टर ताऊ महाश्री और डाक्टर ताउजी ने पूछा - डाक्टर झटका अचानक आप मीटिंग से क्यों जा रहे है ?
डाक्टर झटका ने उत्तर दिया - ओह बादशाहों मेरी तो मती मारी गई है मेरी बीबी के पाँव भारी है अरे मैं उसे " अलीबाबा चालीस चोर " पुस्तक पढ़ने के लिए देकर आया हूँ .
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एक बार ताउजी एक रेल के डिब्बे में सफ़र कर रहे थे . उस डिब्बे में स्त्रियों की संख्या अधिक थी . आदत के मुताबिक वहां उपस्थित हर महिला अपनी उम्र कम करके बता रही थी .
पचास वर्षीय बिंना ने अपनी उम्र पैतीस वर्ष बतलाई . तो शब्बो जी ने कहा अभी वो पच्चीस की दहलीज पर चल रही है . मैडम झिन्गालैला ने कहा - अभी तो वो बस बीस की ही है . झलकन बाई ने कहा - ये तो सब ठीक है अभी मै सोलह की भी नहीं हुई हूँ.
ताउजी उपरी बर्थ पर लेटे थे और उन स्त्रियों की बातो को बड़े ध्यान से सुन रहे थे . अब उनसे रहा नहीं गया और वे अचानक उपरी बर्थ से नीचे कूद पड़े. नीचे उपस्थित स्त्रियाँ अचकचा गई और ताउजी को डाँटते हुए कहा - अरे तुम कहाँ से आ गए ?
ताउजी ने विनम्र शब्दों में उत्तर दिया - अभी अभी पैदा हुआ हूँ .
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एक बार ताउजी भारत भ्रमण पर निकले और अपने मित्र डाक्टर झटका के साथ मुंबई पहुंचे . ताउजी सर उठाकर एक ऊँची इमारत को देख रहे थे उसी समय वहां एक ठग पहुंचा और ताउजी से बोला - ए क्या देख रहो हो तुम्हे मालूम नहीं है की ये मुंबई है यहाँ हर चीज को देखने के लिए रुपये लगते है .
ताउजी ने कहा - मै उस ईमारत की दूसरी मंजिल देख रहा हूँ . उस ठग ने ताउजी से कहा - अच्छा तो चलो चार रुपये निकालो . ताउजी ने उस ठग को चार रुपये दे दिए . ठग रुपये लेकर चला गया .
ताउजी ने अपने मित्र डाक्टर झटका से कहा - मैंने तो सुना था की मुंबई में बहुत ठग रहते है मगर देखो मैंने उसे कैसे ठग लिया . डाक्टर झटका ने ताऊ जी से पूछा - वो कैसे ?
ताउजी ने उत्तर दिया - असल में मै उस ईमारत की चौथी मंजिल देख रहा था . अगर मै उस व्यक्ति से चौथी मंजिल देखने की बात बताता तो वह आदमी मुझसे आठ रुपये चौथी मंजिल देखने के न ले लेता .
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एक बार ताउजी ने अपने पुलिस अफसर से पूछा - अगर कोई पुलिस वाला अपनी डियूटी अच्छी तरह से नहीं करता है तो आप उसे क्या सजा देते है ?
पुलिस अफसर ने उत्तर दिया - ऐसे पुलिस वालो के हम नाम नोट कर लेते है . जब नगर में कोई कवि सम्मेलन, धरना प्रदर्शन होता है तो ऐसे पुलिस वालो की डियूटी हम वहां लगा देते है .
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एक आदमी कुआ खोद रहा था . काफी गहरा गढ्ढा हो गया था . उस गहरे गढ्ढे में वह आदमी गिर गया . उसने बहुत निकलने की कोशिश की पर निकल नहीं पाया . शाम हो गई अँधेरा हो गया था जोरदार ठण्ड पड़ रही थी . उस आदमी ने जोर जोर से आवाजे लगाना शुरू कर दिया अरे कोई मुझे बचालो.....अरे भाई बचालो ... तभी वहां से डाक्टर झटका निकले - उन्होंने अँधेरे में झांककर देखने की कोशिश की . गढ्ढे के अन्दर से आवाज आ रही थी - खुदा के वास्ते मुझे बाहर निकालो . मै ठण्ड के मारे मरा जा रहा हूँ . डाक्टर झटका ने गढ्ढे में झांककर कहा - ठण्ड तो तुम्हे लगेगी ही भाई . लोग तुम पर मिटटी डालना भूल गए है .

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16.12.09

ये खामोश तन्हाई भी जन्नत बन जाती....

काश इस सुहाने मौसम में तुम आ जाती
ये खामोश तन्हाई भी जन्नत बन जाती.
*
तेरी आँखों से एक मुद्दत से नहीं पी है
तेरी अंगड़ाई देखें बरसों गुजर गए है.
*
मेरी ये जिंदगी तेरे वगैर गुजर रही है
मेरी परछाई मुझे ही अब डराने लगी है.
*

14.12.09

मेरी इन आँखों में बसे सारे ख्बाब तुम ले जाओ


मेरी इन आँखों में बसे सारे ख्बाब तुम ले जाओ
दिल में धड़कते सभी अरमां आकर तुम ले जाओ.
**
मेरी दुनिया में तुमको लौट कर आना ही नहीं है
सारे ख़त लौटा दो आकर अपने जबाब ले जाओ.
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आखिर भरी दुनिया में दिल को बहलाने कहाँ जाये
उनसे मोहब्बत हो गई चाहने वाले दीवाने कहाँ जाए.
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12.12.09

यात्रा संस्मरण : ग्वालियर का भव्य अनोखा सूर्य मंदिर

  • विगत सप्ताह मुझे ग्वालियर जाने का अवसर प्राप्त हुआ वैसे तो ग्वालियर शहर ऐतिहासिक है और अपने साथ कई दुर्लभ यादगारे संजोये है. ग्वालियर में राजा मानसिह का किला और वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की समाधी है और भी कई दर्शनीय स्थान है. इस बार मुझे ग्वालियर में भव्य सूर्य मंदिर का अवलोकन करने का मौका मिला. सूर्य मंदिर का पट दिन में ठीक बारह बजे बंद कर दिया जाता है. बारह बजने को दस मिनिट शेष थे तब मै विलम्ब से इस मंदिर में पहुंचा.

सूर्य मन्दिर का प्रवेश सिह द्वार


सूर्य मन्दिर का सामने से लिया गया फोटो


सूर्य मन्दिर के रथ के पहिये

इस मंदिर को बिड़ला स्मृति में बनवाया गया . आम बोलचाल में बिड़ला जी का सूर्य मंदिर भी कहा जाता है. इस मंदिर की भव्यता बस देखते ही बनती है. यह मंदिर अदभुत कलाकृति का अनुपम उदाहरण है. मंदिर की बाहय दीवारों पर धार्मिक देवी देवताओ की, महापुरुषों और साधू संतो के नाम सहित मूर्तियाँ उकेरी गई है. मंदिर के चारो तरह ख़ूबसूरत मनोरम हरियाली लिए विशाल बगीचा है. सूर्य मंदिर एक रथ सहित विशाल आकृति लिए बनाया गया है. सूर्य भगवान के रथ को साथ घोड़े जोत रहे है. रथ के पहिये बनाये गए है. मंदिर के भीतर सूर्य भगवान की भव्य प्रतिमा स्थापित है जो सूर्योदय से लेकर सूर्य के अस्ताचल होने तक सूर्य की किरणों से आलोकित रहती है जो इस मंदिर की एक अनोखी विशेषता है.


मन्दिर की दीवारों पर हिन्दू धार्मिक देवी देवताओ की मूर्तियाँ उकेरी गई है एवं प्रत्येक देवी संतो और महापुरुषों के नाम भी उकेरे गए है .


सूर्यमंदिर के निचले हिस्से में सूर्य भगवान के रथ के पहिये द्रष्टव्य है .


सूर्य मन्दिर का भव्य उपरी हिस्सा अनुपम बेजोड़ कारीगिरी का नायाब नमूना


सूर्य मन्दिर के बांयी और से लिया गया फोटो .




सूर्य मन्दिर के बांयी और से लिया गया फोटो जिसमे सूर्य भगवान के रथ में जुटे हुए घोड़े सूर्य भगवान के रथ को सात घोड़े जोते जाते थे.


अवकाश के दिनों में काफी दूर दूर से दर्शक इस मन्दिर को देखने आते है .






सूर्य मन्दिर की बाहरी दीवार पर भगवान शिव और पारवती की पत्थरो पर उकेरी गई भव्य प्रतिमा

मुख्य सूर्य मन्दिर के पूर्व दिशा में स्थापित सूर्य भगवान का एक मन्दिर

मन्दिर की गुम्बज की चारो दिशाओ में उपरी हिस्सों में विशाल शीशे लगाए गए है जिनमे से सूर्य की किरणे परिवर्तित होकर मंदिर के अन्दर स्थापित भगवान सूर्य के प्रतिमा सीधे पड़ती है जिसके कारण सूर्य भगवान की प्रतिमा प्रकाशमान दिखती रहती है और सूर्य किरणों से आलोकित होकर चमकती रहती है जो अदभुत वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है और दर्शनीय है . भगवान सूर्यदेव की मूर्ती का दर्शन करते समय खुद अपने आप में अनोखी उर्जा के प्रवेश होने का अनुभव होता है.




मन्दिर के चारो और ख़ूबसूरत बाग़ है जिसमे चारो और फैली हरियाली मनमोहक है जिसे निहार कर काफी मानसिक शान्ति का अनुभव होता है . चूंकि मंदिर के नियमो के अनुसार मंदिर परिसर के अन्दर स्थित भगवान सूर्य देव की प्रतिमा की फोटो उतारना मना है इसीलिए मैंने दिव्य भगवान सूर्य देव की मूर्ती की फोटो अपने कैमरे से नहीं उतारी. मंदिर के बाहरी द्रश्यो की फोटो अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ.

ॐ सूर्य देव्यो नमः

10.12.09

कुछ हास्य-परिहास हंसी ठिठोले जोग....

बहुत दिनों से कुछ हास्य-परिहास हंसी ठिठोले वाली पोस्टे पढ़ने को मिल नहीं रही थी इसीलिए मैंने सोचा की कुछ हंसाने की लिखी जाए तो उदास मन में मुस्कराहट बिखेर दे और ताजगी की उमंग पैदा कर दे.. इसी तारतम्य में कुछ जोग ...

पति पत्नी से - क्या कारण है की तुम आजकल मुझसे ज्यादा कुत्ते पर फ़िदा हो ?
पत्नी - कम से कम वह तुम्हारी तरह भौकता तो नहीं है.
***

नई नई बीबी अपने पति से मुस्कुराकर बोली - जानते हो मैंने सोलह दिन केवल तुलसी के पत्ते खाकर गुजारे और दो सालो तक लगातार प्रयेक शुक्रवार को संतोषी माता का व्रत किया तब कही जाकर आपको पति रूप में पाया.
पति - अगर यह सब न करती तो ?
पत्नी ने उत्तर दिया - धत तेरे की समझे नहीं तो कोई आपसे भी गया गुजरा मेरे पल्ले में पड़ता.
***

एक बीबी चटकारे ले लेकर अपनी दूसरी सहेली से कह रही थी अरे तुझे मालूम है मेरे पति की रात को देर से घर लौटने की बुरी आदत थी वह मैंने छुड़ा दी .
सहेली - वह कैसे ?
बीबी - एक रोज वो रात को बारह बजे घर लौटा तो मैंने जोर से आवाज लगाकर कहा क्या बात है मोहन आज तुमने आने में देर कर दी इसके बाद मेरा पति दिन डूबने के पहले घर आने लगा .
सहेली - यह सब कैसे संभव हो गया ?
बीबी - दरअसल मेरे पति का नाम मनोहर है .
***

एक सहेली दूसरी सहेली से - क्या तुम्हारे पति तुम्हे अब भी कांटते है ?
पहली सहेली - नहीं
दूसरी सहेली पहली से - अच्छा तो उनकी काटने की आदत अब छूट गई होगी .
पहली सहेली दूसरी से - नहीं दरअसल उनके दांत अब टूट गए हैं.
***

एक दिन ताउजी ने भारतीय रेल को धोका देने की सोची क्योकि वह कुछ नया ही करना चाहता थे. उन्होंने एक आइडिया सोचा . उन्होंने एक टिकट खरीदा पर रेल में बैठे ही नहीं .
***

एक आदमी अपने पन्द्रह बच्चो के साथ उन्हें जिराफ दिखाने के लिए चिड़िया घर गया और दरबान से कहा इन सब बच्चो को मै जिराफ दिखलाना चाहता हूँ
दरबान ने हैरत से उस आदमी को देखते हुए कहा - ये सारे बच्चे तुम्हारे है . उस आदमी ने कहा - हाँ
दरबान ने कहा - तो तुम लोग यही ठहरो मै जिराफ को यही ले आता हूँ वह तुम लोगो को देख लेगा.
****

प्रेमी अपनी प्रेमिका से - आजकल मेरी शादी के लिए कार वालो के रिश्ते आ रहे है अगर तुम्हारे पिता कार दे सके तो मै तभी शादी करूँगा .
प्रेमिका प्रेमी से - मेरे पिता तुम्हे रेलगाड़ी भी दे सकते है पहले तुम पटरियां बिछवाने का प्रबंध तो करो .
****

9.12.09

जब वो हंसते है तो तोहमत याद आती है

चार दिनों की ये जिन्दगी मिलती है उधार
आंचल में खुशियाँ हो...तो आती है बहार
गर दिल को मिले आंसू और काँटों का हार
तो अक्सर प्यार की होती है...करारी हार
ये शाम फिर से अजनबी सी लगने लगी है
हरी भरी ये जिन्दगी वीरान लगने लगी है
जब वो हंसते है तो तोहमत याद आती है
न चाहकर भी दिल को बैचेन बना देती है
मेरे घरौदे की दहलीज पर वो कदम रखेंगे
बात कहने से पहले मुझे बहुत याद करेंगे।
oooooo

1.12.09

स्वैछिक सेवानिवृति के उपरांत यादगार क्षण ... कभी भूल नहीं सकता

कल दिनाक 30 -11 -2009 को मै मध्यप्रदेश राज्य विद्युत मंडल की से सेवा से ३३ वर्ष आठ माह सफलता पूर्वक पूर्ण करने के पश्चात स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत हो गया हूँ . कल का दिन मेरे जीवन में नई दिशा प्रदान करने वाला दिन रहा . स्वैछिक सेवानिवृति के अवसर पर कार्यालयीन अधिकारियो और सहकमियो द्वारा सम्मान में बिदाई कार्यक्रम आयोजित किया गया. इस अवसर पर अधीक्षण यंत्री, संभागीय अभियंता और परीक्षण संभाग जबलपुर के कर्मचारी उपस्थित थे .

परीक्षण और संचार वृत के अधीक्षण अभियंता माननीय ठाकुर साहब ने अपने उदबोधन में कहा मिश्र एक कर्मठ और सुयोग्य है ..कठिन से कठिन कार्य को आसानी से सम्पादित करते है...उन्हें उम्मीद नहीं थी की मिश्र इतनी जल्दी सेवानिवृति ले लेंगे. संभागीय अभियंता श्री खरे ने कहा की श्री मिश्र सेवानिवृति के उपरांत फुरसत में नहीं बैठेंगे ... इस अवसर पर सभी ने मंगलमय उज्जवल भविष्य की कामना की और भावभीनी बिदाई दी .

गृह निवास पर स्वल्पाहार का आयोजन किया गया. स्वैच्छिक सेवानिवृति के अवसर पर कुछ फोटो लिए गए है जोकि अवलोकनार्थ प्रस्तुत है. कल तक व्यस्त था ... आज अपने आपको स्वछंद महसूस कर रहा हूँ और महसूस कर रहा हूँ की मै अब किसी का चाकर नहीं हूँ और आजाद हूँ ... स्वतंत्रता के साथ साँस ले सकता हूँ और आजादी से अब घूम फिर सकता हूँ .


कार्यालय से बिदाई आयोजन के बाद घर की और रवानगी ..
एक नन्ही बच्ची "टिया " ने आकर मेरा हाथ थामा

कार्यालय सहकर्मियो के साथ बिदा के क्षण....

कार्यालय सहकर्मियो के साथ बिदा के क्षण....एवं बाजू में खड़े कार्यपालन अभियंता श्री मनीष खरे बांयी और



कार्यालय के बाहर मुझे रिसीव करने आये परिवारजन एवं---स्नेही जन

कार्यालय में रिसीव करने आये स्नेही जन...



मेरे निवास में उपस्थित जबलपुर शहर के कवि साहित्यकार और अनेक संस्थाओं से जुड़े ब्लागार भाई डाक्टर
विजय तिवारी
"किसलय" जी

निवास में उपस्थित स्नेही जन..

निवास में उपस्थित स्टेट बार कौंसिल हाईकोर्ट जबलपुर की अनुभाग प्रभारी श्रीमती अंजू निगम और सलमा बेगम...के साथ छायाचित्र


मेरे मित्र मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के महासचिव नलिनकान्त बाजपेई (जनसत्ता).. नौकरी के बाद भी साथ नहीं छूटेगा .....
गृह प्रवेश पर जब मेरी चाची जी ने मेरा सम्मान किया .....


जबलपुर सेन्ट्रल जेल और मिलेट्री जेल के मौलाना हाजी कारी काजी अब्दुल लतीफ़ कादरी जी ने श्री फल और शाल से सम्मानित किया.


कार्यालय से बिदाई के पश्चात मेरे निवास में उपस्थित मध्यप्रदेश ट्रांसमिशन कंपनी के एफ.डी.ठाकुर साहब अधीक्षण अभियंता (परीक्षण और संचार)जबलपुर , श्री निगम संभागीय अभियंता और श्री मनीष खरे संभागीय अभियंता परीक्षण संभाग १ मध्यप्रदेश ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड जबलपुर.....

घर में मेरे बेटे मयूर मिश्र ने पुष्पाहार से सम्मान किया और कहा बस पापा अब मै....सुनकर आंखे नम हो गई की मेरा बाजू तैयार हो गया है .

निवास में आयोजित स्वल्पाहार कार्यकर्म में मित्र जन और स्नेहीजन .
निवास में आयोजित स्वल्पाहार कार्यकर्म में मित्र जन और स्नेहीजन..और मै...
निवास में आयोजित स्वल्पाहार कार्यकर्म में मित्र जन और स्नेहीजन....और मै...

यूं0के0 से आये मेरे भांजे अमित मिश्र ने पुष्पाहार से मेरा सम्मान किया .....

स्वैच्छिक सेवानिवृति पर ये बहुत खुश है...मेरी पत्नी मांडवी मिश्र(बांये)और उसकी सहेली.

सम्मान के ये क्षण....


मयूर मिश्र,मोनू चौरसिया और वरुण

29.11.09

मेरे जीवन का कल का दिन निर्णायक होगा .....

एक समय था की नौकरी के लिए कोई जद्दो जहत नहीं करना पड़ती थी . वाकया सन 1975 के समय का है . जब नौकरियों की भरमार रहती थी . 11 मार्च सन 1976 में मैंने मध्यप्रदेश राज्य विद्युत मंडल में सर्विस ज्वाइन की. उस समय मेरी उम्र मात्र 18 वर्ष एक माह थी और मेरी प्रथम पदस्थापना ग्वालियर में की गई . चूंकि उस समय परिवार में प्रकाशन का कार्य किया जाता था . तरह तरह की पुस्तके प्रकाशित की जाती थी . मेरी रूचि नौकरी में नहीं थी . मुझे हमेशा इस बात का दुःख रहता था की मेरे परिजनों ने मुझे कम उम्र में ही नौकरी में धकेल दिया था . समय बदलने के साथ साथ मैंने विद्युत मंडल के विभिन्न प्रभागों में कुशलता पूर्वक कार्य सम्पादित किया . मुझे मध्यप्रदेश राज्य विद्युत मंडल में कार्य करते 33 वर्ष आठ माह १९ दिन हो चुके है .

इस दौरान मैंने अनुभव किया है की इस विभाग में लगातार कर्मियो पर कार्य का बोझ लादा जा रहा है . संस्थान में वर्षो से नई नियुक्तियां नहीं की जा रही है . पहले जैसे अधिकारी भी नहीं रहे है . नए अधिकारियो में मानवीय संवेदनाओ का सर्वथा अभाव सा हो गया है . नियम कानूनों से अनभिज्ञ अधिकारी भ्रष्ट और निरंकुश है और लगातार कर्मचारियो के विरुद्ध कहर बरपा रहे है जिसका विपरीत प्रभाव कर्मचारियो की कार्य क्षमता पर पड़ रहा है . संस्थान में इस समय तकनीकी और गैर तकनीकी कर्मचारियो को वर्ग विभेद कर बांटा जा रहा है जिसके फलस्वरूप संस्थान का भविष्य राजनीतिक कारणों के चलते उज्जवल नहीं है .

सर्विस में सफलतापूर्वक लगातार कार्य करने के बाद मध्यप्रदेश राज्य मंडल की सेवाओं से कल दिनाक 30 -11 -2009 को मै स्वैच्छिक सेवानिवृति ले रहा हूँ . सेवानिवृति लेने के उपरांत मैंने गरीब विकलांग जनों और समाज में पीड़ित जनों की सेवा करने का और हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार करने लेखन कार्य करने का संकल्प ले लिया है..... स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने के उपरांत कल के दिन के बाद का समय मेरे जीवन में निर्णायक मोड़ लायेगा ऐसा मै ईश्वर से कामना करता हूँ .

महेन्द्र मिश्र
9926382551
जबलपुर

23.11.09

तू ही बता दे जानम मेरी इस कलम की अदा क्या कम है

जब तक बहारे आती रहेंगी, तब तक फूल खिलते रहेंगें
तेरी यादे जेहन में रहेंगी, तब तक दिल जिन्दा रहेगा.
*
न जाने हर आशना न जाने दगा कर बैठा मुझसे क्यों
हर वक्त हम से हर बार रूठा था हमसे ही न जाने क्यों.
*
नफ़रत भरे तेरे अल्फाजो से हम कई कविताएं उकेरते है
तू ही बता दे जानम मेरी इस कलम की अदा क्या है कम.
*

17.11.09

उनसे बेहतर उनकी यादे जो ख्वाबो में आती है

मस्त फिजाओ तुम मुझे उनकी याद न दिलाओ
मेरे इस तड़फते दिल को तुम और न तडफाओ.
***

मेरा सन्देश उन तक...जाते-जाते तुम ले जाना
मै नहीं भूला हूँ उसे तुम ये सन्देश पहुंचा देना.
***

उनसे बेहतर उनकी यादे जो ख्वाबो में आती है
दफ़न हो जाती ये जान यादो के सहारे जिन्दा है.

***

12.11.09

माइक्रो पोस्ट ....

भारतीय संस्कृति कभी बहुत ही उच्चकोटि की थी . भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ परम्पराएं संसार भर में सम्मान की नजर से देखी जाती थी पर अन्धकार युग में विदेशी दासता के साथ साथ भारतीय परम्पराओ में अनेको विकृतियो ने प्रवेश कर लिया और उनमे कुरीतियों अन्धविश्वासों और मूढ़ मान्यताओ ने अपनी गहरी जड़ें जमा ली है .

वर्णाश्रम व्यवस्था सनातन है पर जाति पांति के नाम पर बरती जाने वाली नीच और छुआछूत के लिए उसमे कोई स्थान है . मनुष्यमात्र एक है . गुण कर्म स्वभाव के कारण किसी को उंच नीच ठहराया जा सकता है पर जन्म और वंश के कारण न कोई उंच होता है और न कोई नीच होता है .

नर और नारी के बीच बरती जाने वाली असमानता भी इसी प्रकार अनुचित है . मनुष्य जाति के दोनों घटक सामान्य रूप से एक है उनके बीच भेदभाव उत्पन्न करने वाली प्रथाओ को अमान्य ठहराया जाना चाहिए . परदा प्रथा जैसे रिवाज इस युग में स्वीकार्य योग्य नहीं होना चाहिए .

9.11.09

तुझे पल भर देखें वगैर मै घड़ी भर कही रह नहीं पाता

तुझे पल भर देखें वगैर मै घड़ी भर कही रह नहीं पाता
तमाम कोशिशे करने के वाबजूद मै कहीं रह नहीं पाता.
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उस घडी का मुझे अफसोस है दिल जब तुमसे लगा बैठे
तेरे इस प्यार में जानम....अपनी हर ख़ुशी मै लुटा बैठा.
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दुनिया लाख सितम करे....मगर मै तेरा साथ न छोडूंगा
खुदा लाख मुझ से रूठे मगर मै तुझसे खफा न होऊंगा.
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